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मन का माध्यम : रोग निवारण का साधन रेकी

मन अपने आप में एक अलग ही तत्व है। जब वह सही होता है तो सारे संसार की शक्ति मिलकर भी उसे गलत नहीं ठहरा सकती, फिर चाहे सारा संसार उससे अलग ही क्यों न सोचे। और जब वह गलत होता है तो सारे संसार की शक्ति मिलकर भी उसे सही नहीं कर सकती। मन की शक्ति के उदाहरणों से इतिहास भरा पडा है। जैसे कौरवों ने जब मान लिया की पांडवों को उनका राज्य नहीं देना है तो भगवान् श्री कृष्ण के समझाने के बावजूद भी वे नहीं माने और महाभारत के युद्ध की घटना सामने आई। मन की शक्ति असीम और अदभुद है। रेकी का माध्यम मिलने पर मन की शक्ति बढ़ने की क्रिया बहुत तेजी से होती है। रेकी उत्प्रेरक का कार्य करती है इसका कारण यह है कि मन कार्य करता है प्राण शक्ति से, वास्तव में मन तो जड़ वस्तु है परन्तु वह चलायमान है आत्मा (प्राण शक्ति ) से । मन सदेव लिप्त रहता है विभिन्न – विभिन्न तम, रज और सत गुणी संस्कारों में और उसी अनुसार कार्य करता है । रेकी भी प्राण शक्ति ही है और यह हमारे शरीर में अवस्थित प्राणों तक पहुंचना चाहती है इसलिए मन के ऊपर के संस्कारों को त्वरित गति से हटाती है । संस्कारों का मेल हटने के कारण मन आत्म प्रकाश से प्रकाशित होता है और उसकी शक्ति बढती है इसलिए रेकी स्वयं मन को प्रकाशित होने में मदद करती है ।

मन की शक्ति कोई साधारण बात नहीं है, अगर हम समझना चाहते हैं कि मन किस तरह कार्य करता है तो उसे अपने नियंत्रण में लाना होगा । क्योंकि मनःशक्ति अत्यंत शुक्ष्म गति से कार्य करती है । उसकी सूक्ष्मता को समझना ही उसकी शक्ति को जानना है । ध्यान, योग, साधना इसकी सूक्ष्मता को समझने के माध्यम हैं । रेकी मन को नियंत्रण करने का और मन की शक्ति को समझने का सबसे सरल साधन है । मन और शरीर में प्रकटीकरण के अलावा और कोई अंतर नहीं है, शरीर जड़ अभिव्यक्ति है और मन उसी की शुक्ष्म अभिव्यक्ति। वाष्प रूप में पानी अदृश्य रहता है और द्रवित होने पर वाष्प तरल होकर पानी के रूप में आ जाती है और हिमकरण करने पर ठोस बर्फ बन जाती है, उसी प्रकार मन भी जीवन और शरीर बन सकता है, विध्युतमय या “द्रवरूप” प्राण या “घन रूप” शरीर ।

मनःशक्ति से आप शरीर के प्राण में और स्वयं शरीर में भी परिवर्तन उपलब्ध कर सकते हैं । यह मन ही है जो शरीर को बल प्रदान करता है। शरीर को स्वास्थ्यवर्धक उत्तेजना दी जाय तो मन को भी बेहतर लगता है । यही कारण है कि जो लोग रेकी करते है वे मन और शरीर दोनों से सुन्दर होते हैं और उनका आत्म विश्वास बढ़ा हुआ होता है । क्योंकि रेकी हमारे मन ही नहीं प्राण शक्ति को भी उत्तेजित करती है. शरीर और मन दौनों एक दुसरे से सम्बंधित हैं, मन के साथ कुछ होता है तो शरीर पर तुरंत असर दिखाई दे जाता है और शरीर पर कुछ होता है तो उसका असर मन पर तुरंत दिखाई पड़ जाता है। इसलिए हम मन पर शरीर के माध्यम से और शरीर पर मन के माध्यम से प्रभाव डाल सकते हैं। रेकी करने से यह कार्य सरल हो जाता है । हम में से करीब करीब सभी व्यक्ति चाहते हैं कि जैसे परमात्मा जैसा चाहता है वैसा ही हो जाता है, तो हम भी वैसा ही कर सकें कि, इधर हम सोचें और उधर घटना घट जाए । मन में हम सब असंभव को संभव करना चाहते हैं (कार्टून फ़िल्में भी हमारे मन की ही उपज हैं )। मन आपको कुछ भी करने की क्षमता प्रदान कर सकता है इसलिए पहले छोटी छोटी बातों में इसका प्रयोग करके देखें, जब तक उसकी पूर्ण शक्ति को विकसित न कर लें। इस हेतु रोजाना रेकी करने के दौरान अपनी साँसों की गति को धीमें धीमें नियंत्रित करें और उसके आवागमन को गहरे तक समझने लगें और इस दौरान शरीर पर होने वाले प्रभावों को भी देखें और उस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दें । धीरे धीरे जब आप सभी ओर से प्रतिक्रिया विहीन हो जायेगे और साँसों पर नियंत्रण करना शुरू कर देगे तो जान लीजिये मन की शक्ति को समझने और अहसास करने के लायक आप हो गए। अगर नित्य प्रति आप यह अभ्यास कम से कम एक घंटा सुबह और एक घंटा शाम नहीं कर सकते तो अकस्मात मनःशक्ति पर पूर्ण निर्भर होने का प्रयास भी नहीं करें। मन की शक्ति को हमें धीरे धीरे तब तक प्रशिक्षित करना होता है जब तक हम पूर्ण रूप से यह नहीं जान जाते कि मनःशक्ति किस प्रकार काम करती है ।

मन लाभप्रद और हानिप्रद , दोनो ही काम कर सकता है। यह अत्यंत ही धूर्त होता है अतः इसके प्रति सहज एवं सजग रहना आवश्यक है । एक बार एक महिला के गले में बुरी तरह संक्रमण हो गया, संक्रमण इतना कि वे कुछ भी निगल नहीं सकती थी। वह महिला एक उच्च मनःस्थिति वाले संत के पास गई और रो-रोकर कहने लगी ” मुझे इस रोग से मुक्त करने हेतु जो भी कर सकते हैं आप करें ” . संत ने उससे कहा “ तुम्हारे मन ने तुम्हारी ये दशा बनाई है” उस स्त्री को पता नहीं था कि संत उसके गले पर हाथ रखकर अपने विचारों की शक्ति वहां उतार रहे थे, उसे सिर्फ इतना मालूम था कि संत के हाथ रखने के पश्चात वह खा-पी सकती थी, उसे कोई दर्द नहीं था और वह खुश थी । संत के वहां से आजाने के पश्चात उसे अपने स्वस्थ होने पर शंका हुई और उसने जाकर आईने में अपने गले को देखा और पाया कि गले की फोड़े तो वैसे के वैसे ही हैं तो तुरंत ही उसके गले का दर्द भी लौट आया और वह चीख उठी। वह वापस संत के पास गई , उन्होंने उससे पूछा कि ”तुमने क्या किया । स्त्री ने जवाब दिया “ मैंने आईने में अपना गला देखा” . संत ने कहा “मैंने ईश्वर के प्रकाश (रेकी) में तुम्हारा गला स्वस्थ देखा था इसलिए तुम ठीक हो गई थी परन्तु तुमने आईने में रोग को देखा और अब तुम्हें फिर से दर्द हो रहा है ” । उस स्त्री का मन ग्रहणशील था अतः दुबारा संत ने जब एक गिलास पानी पीने को दिया तो वह पानी पीकर ठीक हो गई । उसके बाद दुबारा उसने गला आईने में देखने का प्रयास नहीं किया । इससे यह निश्चित होता है कि मन बहुत कुछ कर सकता है । स्नायुविक रोगों में, जो गलत विचारों के कारण उत्पन्न होते हैं, मन अत्यंत शीघ्रता से स्वास्थ्यता ला सकता है, जब उसकी शक्ति का सही तरीके से उपयोग किया जाय। उपरोक्त स्त्री के मामले में संत का तपोबल और मनःशक्ति थी जिसने तुरंत कार्य किया । साथ ही स्त्री की ग्रहणशीलता भी थी । परन्तु आज के जमाने में वैसे संत भी नहीं और अगर है भी तो सहजता से उपलब्ध नहीं हैं इसलिए रेकी की पुनः खोज हुई । चूँकि रेकी स्वतः ही कार्य कर सकती है अतः इसे हर कोई व्यक्ति सीख कर कर सकता है, सिर्फ उसकी मन की ग्रहणशीलता अच्छी होनी चाहिए।

मन माया के सम्मोहन में रहता है । यह माया का संसार है और मनुष्य को यहाँ माया के सम्मोहन में रखा जाता है। हमारे मन ने जता दिया है कि हम कई सीमाओं में बंधे हैं , कोई कहता है कि कॉफ़ी पिए बिना मेरा काम नहीं चल सकता, कोई कहता है जेब में फलाने द्वारा दी गई ताबीज रखने पर ही वह कुछ सोच सकता है या कर सकता है आदि । ऐसे उदाहरणों से यह संसार भरा पड़ा है। जब हम रेकी करते हैं तो हम मन के पार जाने लगते हैं, मन की सीमाओं के बंधन टूटने लगते हैं, हमारी अध्यात्मिक जागृति होती है और मन की शक्ति विकसित होने लगती है। इसलिए भारत में आत्मा को अज्ञान के रोग से मुक्त करने अर्थात आत्मा को ढांक कर रखने वाले अज्ञान को दूर करने को ही सर्वोत्तम रोग-निवारक कहा गया है, क्योंकि वही स्थाई होता है। माया से मुक्त होने के लिए ईश्वर में जागें । मनःशक्ति बढाने का यह सबसे सरल तरीका है कि ईश्वर की भक्ति में लींन रहें, उसके चिंतन में इस प्रकार मगन रहें कि वे अकस्मात् माया के सारे बंधन खोल देवें तब आप जानेंगे कि शरीर उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना हम समझते हैं । इसका यह मतलब नहीं है कि शरीर का बिलकुल ध्यान नहीं रहें, इसके लिए भी कुछ नियम हैं उन्हीं के अंतर्गत शरीर का भी ध्यान रखें ।

मनः शक्ति को हमेंशा अधिक रखें, इसे इतना बढायें कि चाहे कुछ भी क्यों न हो, जीवन में किसी भी परिस्थिति का सामना निडरता से करते हुए आप अविचलित खड़े रह सकें । यदि मनःशक्ति में, ईश्वर में विश्वास रखते हैं तो किसी भी परिस्थिति का सामना करने को सदा तैयार रहेंगे , दुखों से कभी भी नहीं घबराएंगे, आशावादी और विचारों से बलवान बनेंगे। आपकी अंतरानुभूति ही सबसे महत्वपूर्ण है।

नित्य रेकी करें, किसी के भी अधिकारों का और प्रकृति की नियमों का अतिक्रमण नहीं करें। रेकी देवें और उसकी रोग निवारण शक्ति की महिमा का श्रेय स्वयं कभी न लेवें । जितना अधिक आप यह चाहेंगे कि लोग ये जाने कि आप कितने महान हैं , उतने ही आप मनःशक्ति से क्षीण होते चले जायेगे । जितना अधिक आप अपनी मनःशक्ति को प्रदर्शित करके लोगों पर उसकी छाप डालना चाहेंगे उतनी ही मनःशक्ति आपके पास कम होती चली जायेगी । अपनी अंतरात्मा के समक्ष और सर्वशक्तिमान परमात्मा के समक्ष पवित्र और अहंकार रहित बनकर खड़े रहें तभी परमात्मा आपको अदभुद शक्तियां और अनुभव प्रदान करेंगे । ब्रह्मचर्य का पालन करें, संतुलित आहार लें, सदा खुश रहें और मुस्कुराते रहें । आनंद को अपनी अंतरात्मा से जोड़ें, जो इसे समझते हैं वे प्राणशक्ति (रेकी) से सदैव आवेशित रहते हैं । जब आप अन्दर से आनंदित होते हैं तो ईश्वर की अदम्य शक्ति आप में प्रवेश करती है, आपकी मनःशक्ति बढती है । आनंद जब सच्चा होता है तब आप मुस्कराहट के राजकुमार होते हैं । सच्ची मुस्कराहट प्राणशक्ति को शरीर की प्रत्येक कोशिका में भेजती है। आनंदित मनुष्य रोग का आसानी से शिकार नहीं होता क्योंकि आनंदित शरीर ब्रह्मांडीय ऊर्जा (रेकी ) को अधिक मात्र में स्वतः ही अपने अन्दर खींचता हैं । ऐसी मुस्कराहट ध्यान से ही उपलब्ध होती है अतः प्रतिदिन गहरा ध्यान करें । जब आप रेकी (ईश्वर ) में लीन रहते हैं तब आप सचेतन रूप से उसकी उपस्थिति को अपने शरीर में प्रकट कर सकते हैं ।

अध्यात्म क्या है ?​

धर्म, मजहब, सम्प्रदाय अनेक हैं।  सभी का सार एक है। जिसके लिए एक शब्द प्रयोग किया जा सकता है  वो है “अध्यात्म” . अध्यात्म – आधी + आत्म, अर्थात आत्मतत्व का आधिक्य यानी अधिक आत्माओं से सम्बंधित।  देह रहित आत्माओं का मनुष्यता के परिदृश्य में कोई औचित्य नहीं, इसलिए अधिक आत्माओं का स्पष्ट अर्थ है – समाज।  जीते जागते जनों से निर्मित समाज। समाज निर्माण में, उसे सुदृढ़ करने में, सजाये-सँवारे रखने में जो तथ्य आवश्यक हैं, सहायक हैं, वह आध्यात्मिक हैं।  इस बात को ईशावास्योपनिषद दे मंत्र 6 एवं 7 तथा श्रीमद्भागवतगीता के 9/6 , 9/29 से 32 तक के श्लोक से भी प्रमाणित किया जा सकता है। जिनके धर्म-कर्म-अध्यात्म का सारा संरजाम  “निज” के लिए होता है, उन्हें स्वार्थी, पाखंडी, पलायनवादी कहा जा सकता है- अध्यात्मिक कतई नहीं। अध्यात्मके के साथ जो दूसरा शब्द जुड़ा है, वह है – योग। योग अर्थात जोड़, मेल, युक्ति, मुक्ति, साधन तथा उपाय।  व्यक्ति को व्यक्ति से, व्यष्टि को समष्टि से जोड़ने वाली पद्धति योग है। योग का उद्देश्य है – समाज में समानता कायम करना। “समत्व योग उच्चयते” . समत्व – समदृष्टि-अद्वैत की फिलॉसफी इसी से प्रमाणित हुआ करती है।  योग इस उद्देश्यपूर्ति हित संघर्ष का साधन है, साध्य नहीं।

योग को समझने के लिए तीन बातें समझनी जरुरी हैं।  पहली बात – चार प्रकार की वृतियों के लोग होते हैं, जिन्हें भारतीय  ऋषियों ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कहा है। ब्रह्म में विचरण करने वाला प्रथम वृत्ति का व्यक्ति उपदेशक-शिक्षक की भूमिका में होता है।  वह आदरणीय होता है “पूज्य” नहीं, क्योंकि मानवीय कमजोरियां उसमें भी होती है। दूसरी वृत्ति का व्यक्ति अराजक तत्वों से समाज की रक्षा करता है। तीसरी वृत्ति का व्यक्ति विनिमय-व्यापार द्वारा जीवन के लिए जरुरी सामग्रियों का प्रबंध करता है। शूद्र श्रमिक, सेवक की भूमिका में रहता है।  यह वर्ग शूद्र इसलिए है की शेष तीनों की शुद्धता-जीवंतता-प्रभावोत्पादकता का यह आधार है। अब कीचड से कीचड़ तो धुलता नहीं, अतः यह चतुर्थ वर्ग ही वस्तुतः शुद्ध होता है। इसलिए शेष को साफ़ और सहज रख पाता है। यह तथ्य हर किसी को ज्ञात होने के कारण उल्लेखनीय नहीं है की मानव का वर्गीकरण गुण – कर्म के आधार पर हुआ है, जन्म के आधार पर नहीं।

दूसरी बात – मनुष्य दो चीजों से मिलकर बना है – देह और आत्मा।  देह में स्थूल, भौतिक अथवा माया और आत्मा है – शुक्षम, ऊर्जा , चेतना या ब्रह्म  . आत्मा ही “अर्थ” है, बगैर इसके देह व्यर्थ है। जिस व्यक्ति की आत्मा सुप्त है, यानी जो सिर्फ शरीर के तल पर जीता है वह पशु है। जागृत आत्मा अपने को चार तरह से अभिव्यक्त करती है – मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।  इन्हें अंतःकरण चतुष्टय या अस्मिता भी कहते हैं। इन्द्रियों के विषय-स्पर्श, रस, गंध, दृश्य, श्रवण से मन में हलचल होती है, वह जुड़ती है – स्मिता से। चित्त में संचित संस्कार साथ देते हैं , इस तरह विचार बनते हैं और व्यक्ति आचार हेतु  चल पड़ता है। इसलिए योग के कार्य में सम्मिलित है – मन को स्थिर करना, अहम को तथा चित्त को निष्काम बनाना। बुद्धि निर्णय करती है-चित्त संकल्प करता है और व्यक्ति क्रियाशील हो जाता है। अतः योग के कार्य में – बुद्धि को स्थिर और चित्त को दृढ़ करना है।

तीसरी बात  – मानव चेतन होने के नाते स्वतंत्रता से  वांछित कर्म करने की शक्ति से युक्त है। कर्म की स्वतंत्रता के कारण वह किये गए कर्म के फल से आबद्ध है।  कहने का भाव यह है की मनुष्य पुरुषार्थी (भाग्य निर्माता) भी है और भाग्य संस्कार से बंधा (नियति के अधीन) हुआ भी।  योग पुरुषार्थ में अभिवृद्धि करता है, जिससे भाग्य-संस्कार कमजोर होता है। भाग्य अर्थात पूर्व जन्मों के कर्मों का फल।  संस्कार अर्थात इस जन्म के कर्मों का फल। वृत्तियों व् अंतःकरण चतुरष्टय आधार पर योग चार हैं – कर्म, ज्ञान, ध्यान और भक्ति।  योग की सिद्धि के लिए प्रत्याहार (एकाग्रता), धारणा,(शुभ विचार-सिंचन), ध्यान (मैं शरीर मात्रा नहीं) और समाधि(समाज में अधिकाधिक समानता का उपक्रम) आवश्यक है।  अस्तेय (अकेले उपभोग न करना), ब्रह्मचर्य (सत्य के अनुरूप आचरण), अहिंसा (स्वार्थवश आचरण न करना) और “सत्य” भी आवश्यक है।  चारों योगों में मुख्य तत्व है – “वैराग्य” , अपने लिए चाहना राग और सब के लिए चाहना वैराग्य । राग के रूप है – लोभ, मोह, वासना, मद, क्रोध, मत्सर यानी षडरिपु।  कर्म योग के सन्दर्भ में वैराग्य का त्यागना असंभव जितना ही कठिन है। यह संभव तब है, जब क्रिया समाज सापेक्ष होगी – व्यक्ति सापेक्ष नहीं। दरअसल ऐसे कर्म ही कर्म हैं और इनमें प्रवीणता – कुशलता प्राप्त करना ही योग है – योगः कर्मेशु कौशलम।

ज्ञान योग के सन्दर्भ में वैराग्य का अर्थ है – विद्या को ज्ञान बनाना।  विद्या का अर्थ है – रास्तों की जानकारी। जानकारी को सर्वहिताय प्रयुक्त करना ही ज्ञान है।  ध्यान योग के सन्दर्भ में वैराग्य का अर्थ है – कामना का अभाव, अर्थात निष्काम भाव। भक्ति योग के परिपेक्ष्य में ”वैराग्य”  है – ईश्वरीय सत्ता के प्रति श्रद्धापूर्वक समग्र समर्पण। अध्यात्म प्रेमी योग पथ का पथिक बनकर जब मंजिल तक पहुँचता है, तब वह “अध्यात्मयोगी”  हो जाता है। सम्बुद्ध-रहस्यदर्शी-समदर्शी-जीवन्मुक्त-ममवत्ता को उपलब्ध अद्वैत – समष्टि किसी भी नाम से उसे अलंकृत किया जा सकता है।

“रेकीतीर्थ फीचर्स”

रेकी परिचय

रेकी वो तकनीक है  जिसके द्वारा तनाव कम होते हैं एवं मन को सुकून मिलता है. यह मूल रूप से जापानी तकनीक के स्वरुप में हमारे सामने आई है.वैसे यह हजारों वर्षों पहले की हाथ रख कर उपचार करने कि विद्या है। यह तकनीक अत्यंत सरल एवं शक्तिशाली है।

रेकी शब्द जापानी “कांजी” लिपि के  “रे” और “की” से मिलकर बना है।

ऊपर दिए गए चित्र  में “रे” ऊपर वाला अक्षर और “की” निचे वाला अक्षर है।  “रे” का अर्थ है “सर्व व्यापी”, ज्यादातर सभी ने इसी परिभाषा को स्वीकारा है. ये अर्थ काफी सामान्य है।  जापानी चित्राक्षरों या आकृतियों के बहुत ही गूढ़ अर्थ होते हैं। ऐसे ही “रे” का गूढ़ अर्थ है यथार्थ ज्ञान या पारलौकिक  चेतना . जो ईश्वर से या अंतर चेतना से आती है। जो सर्व शक्ति सम्पन्न है । ये प्रत्येक व्यक्ति को पूर्णतः समझती है और उनकी समस्याओं और कठिनाइयों को भी जानती है और ये भी जानती है की इनका उपचार कैसे किया  जाय।

इसी तरह “की” का अर्थ है प्राण  या जीवन शक्ति। विभिन्न संस्कृतियों  और धर्मों ने इसे अलग अलग नाम दिए हैं। संस्कृत में इसे  प्राण शक्ति कहा है। इन्ही अर्थों में “की” समस्त प्राणियों की जीवनी शक्ति है।  यह गैर शारीरिक ऊर्जा है जो सभी प्राणियों में व्याप्त है। इसके निर्माता हम स्वयं हैं अर्थात जैसी हमारी जीवन शैली होगी वैसी ही  ये ऊर्जा होगी। हमारे जीवित रहने तक ये हमें घेरे रहती है। मृत्यु के बाद यह ऊर्जा अनंत में विलीन हो जाती है। हमारी जीवन शैली के आधार पर इस ऊर्जा का निम्न या उच्च होना आधारित होता है।  निम्न ऊर्जा जिसे हम नकारात्मक ऊर्जा भी कह सकते हैं, अर्थात इस ऊर्जा के प्रवाह में अनेक अवरोध हैं। नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने पर प्राणी के रोगी होने की संभावना बन जाती जाती है। उच्च ऊर्जा अर्थात सकारात्मक उर्जा के प्रवाह से हम स्वस्थ और प्रसन्न रहते हैं.

इस तरह   हमारे जीवन में प्राणशक्ति अर्थात “रेकी” का बहुत महत्व है।

 

About us

ReikiTirth team is a healing foundation dedicated to spreading love and healing through various spiritual and scientific practices.
The reikitirth’s logo, a flower budding in the middle of the ocean of love signifies expanding consciousness.

We believe that we are completely responsible for everything in our life, the best and the worst. We have the power to choose; suffering or divine bliss. What we choose we experience. The miracle lies in the present moment.

Time and space are illusions created by the unenlightened mind. The forgiveness, gratitude, unconditional love and acceptance must be an integral part of our art of living. We believe that a touch of love creates miracles and ignites the divine compassion. We believe that the planet Earth and its
inhabitants are interwoven by a thread of love. In the unconditional love of a child, we can feel the presence of God. Where attachment ends, love
begins. Most of us have a wrong perception about ourselves and are completely ignorant about our own truth due to a wrongly structured belief system.

Our Mission and Vision
  • To establish a family where people from all walks of life can share compassion
  • Making people understand root cause of their suffering and how to heal themselves
  • Making people realize that they are born divine and that every cell of their body has got divinity
  • Helping people develop trust in themselves and omnipresent divine powers regardless of the name one chooses to call it

गुरुदेव बसंतकुमार – माँ उषाबसंत सोनी
गुरुदेव बसंत कुमार जी सोनी का परिचय  शब्दों में व्यक्त करने का अर्थ है सूरज को दिया दिखाना।  परन्तु जगत के लिए शाब्दिक परिचय ही सार्थक होगा। एक छोटा सा प्रयास है, उनके विशाल व्यक्तित्व को इन शब्दों के माध्यम से आप तक प्रेषित करने का।

7  नवम्बर 1949  को झाबुआ जिले के तत्कालीन गाँव अलीराजपुर में एक अत्यंत वैभवशाली, सामाजिक एवं प्रतिष्ठित परिवार के सबसे बड़े पुत्र के रूप में गुरुदेव का जन्म हुआ। परिवार का वातावरण शुद्धरूप से धार्मिक होने के कारण बचपन से ही उनके जीवन में प्रभु प्रेम की प्यास का प्रादुर्भाव हुआ। मंदिर में जाना, भगवत कथा सुनना, संतों के सत्संग सुनना एवं उनका सानिध्य उन्हें बचपन से ही रुचिकर लगता था।  इस कारण वे बचपन से ही आध्यात्मिकता के रंग में रंग गए। शिक्षा के प्रति विशेष झुकाव के कारण हर कक्षा में प्रथम आने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ। संस्कृत एवं हिंदी उनके रुचिकर विषयों में से थे। हिंदी के कुछ कवियों का तो उनपर विशेष प्रभाव रहा. “कामायनी” उनका अतिप्रिय काव्यग्रंथ था।

जीवन के पथ पर ऐसे ही अग्रसर होते हुए इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की और सांसारिक रीती के अनुसार भिलाई स्टील प्लांट  में अपने कार्य की शुरुआत की। इसी सांसारिक रिवाजों को निभाते हुए वर्ष 1974 में मां उषा को अपनी अर्धांगिनी के रूप में चुनकर एक नए जीवन की शुरुआत की । पिता का साया 1973 में उठ जाने और परिवार के प्रति अपनी गहरी जिम्मेदारी के अहसास के कारण गुरुदेव ने भिलाई स्टील प्लांट का अपना जॉब छोड़कर वर्ष 1976 में उन्होंने इंदौर में अपने भाइयों के साथ मिलकर स्वयं का “सर्जिकल बेंडेज और कॉटन” का व्यापार “सॉन्टेक्स रोल्ड बेंडेज वर्क्स ” के नाम से प्रारम्भ किया।  परिवार के प्रति गहरी निष्ठा और अपने भाइयों के प्रति उनका अथाह स्नेह उनके अंतरतम में सदा रहा. जिसे उन्होंने अपने अंतिम समय तक निभाया। इसी स्नेह को सभी भाइयों ने भी महसूस किया और ये व्यापार आज भी गुरुदेव की अनुपस्थिति में भी उसी तरह संचालित हो रहा है।

अपनी सभी सांसारिक जीम्मेदारियाँ निभाते हुए गुरुदेव ने जीवन के हर क्षेत्र में पूर्णता हासिल की।  साथ ही अपनी आध्यात्मिक यात्रा की सूत्रधरा को भी उन्होंने संभाले रखा। उनके अध्यात्म की तरफ रुझान का प्रभाव माँ  उषा पर भी पड़ना स्वाभाविक था। “ओशो” के वे परम भक्त थे। ओशो को सुनना गुरुदेव और माँ उषा के नित्यकर्मों में शामिल रहा। उनके विचारों का प्रभाव गुरुदेव और माँ के जीवन में स्पष्ट दिखाई देता है।

आध्यात्मिक  संस्कारों के उदय होते ही सौभाग्यवश गुरुदेव और माँ उषा के जीवन में ‘ब्रह्मलीन पूज्य स्वामी शिवोमतीर्थ जी महाराज “ का पदार्पण हुआ।  वर्ष 1989 में दोनों के जीवन में सौभाग्य का क्षण आया जब स्वामी जी द्वारा दोनों की शक्तिपात दीक्षा संपन्न हुई। इसके बाद तो दोनों की जीवन शैली ही बदल गई। अनेक सिद्ध संतों का सानिध्य इन्हें प्राप्त होने लगा।  कई आध्यात्मिक कोर्सेस उन्होंने किये। इनमे से “यस कोर्स”, “होलोग्राम”, “स्वर योग”, क्रिया योग”, “शिवयोग”, “3 स्टेप ब्रीथिंग कोर्स”, “प्राणिक हीलिंग”, “क्रिस्टल हीलिंग”, “सरश्री {हैप्पी थॉट्स} मुख्य हैं। बसंत प्रभु रऑस्क्युशन {ऑस्ट्रेलया} के सदस्य रहे, थियोसोफिकल क्लासेस के सदस्य रहे, और ज्योतिष, टैरोकार्ड और रमल की शिक्षा दीक्षा भी हासिल की। माँ उषा भी “चिल्ड्रन यस कोर्स” और “चिल्ड्रन रेकी क्लास” की टीचर बानी। ।   इन्हीं में से एक “यस कोर्स” के माध्यम से “गुरुदेव अविनाश खरे” का उनके जीवन में आगमन हुआ। गुरुदेव अविनाश खरे के सानिध्य व् शिक्षा ने दोनों के जीवन को ही बदल दिया। जीवन जीने की कला क्या है ? इसे उन्होंने आत्मसात ही कर लिया।

ऐसे ही आध्यात्मिक दिशा में बढ़ते हुए गुरुदेव और माँ  उषा के जीवन में रेकी का आगमन हुआ। वर्ष 1992 में रेकी की प्रथम डिग्री प्राप्त कर वर्ष 1995  में श्री सुब्रहमण्यम{मणि} जी से रेकी मास्टर डिग्री प्राप्त की। उन्हीं से ही दोनों रेकी ग्रैंड मास्टर भी बने और दोनों ही रेकी मय हो गए। जिस आनंद को गुरुदेव ने रेकी में पाया उसे सारे जगत में फैलाने का संकल्प लेकर इसी आयाम में जुड़ गए और तब नवनिर्माण हुआ  ‘रेकी तीर्थ” का। तब से निरंतर रेकी क्लासेस लेना शुरू की जो आज भी जारी है। इसी कड़ी में दोनों ने रेकी को गहनता से अनुभव करते हुए सभी के मार्गदर्शन के लिये “रेकीतीर्थ” नामक किताब की रचना की।

रेकी के हर सेमीनार में बसंत प्रभु का व्यवहार अत्यंत गरिमामय और प्रभावशाली रहता था।  अपने आतंरिक आनंद को सारे जगत में बांटने की अभिलाषा उनमे इतनी गहरी थी की वे सेमीनार में लगातार २० घंटे धारा प्रवाह बोलते थे  श्रोतागण भी उसका आनंद लेते हुए उठने का नाम ही नहीं लेते थे। इस आनंद को बाँटते बाँटते आदरणीय गुरुदेव बसंत प्रभु दिनांक 28 दिसंबर 2014  के दिन “पुष्पगिरी तीर्थ” {सोनकच्छ} जैसी पुण्य भूमि पर रेकी के थर्ड “A” डिग्री के सेमीनार को पूर्ण कर उसी रात्रि माँ उषा की गोद में अंतिम स्वास ली और अपने  शरीर को त्याग कर ब्रह्मलीन हो गए।

शरीर तो पञ्चतत्व में लीन हो गया पर गुरुदेव बसंत प्रभु की आत्मा माँ उषा के माध्यम से आज भी हर सेमीनार में वैसा ही रस बरसा रही है, जो गत  25 वर्षों से बहता आ रहा था।

“रेकी तीर्थ” आज भी वैसा ही जीवंत है।  गुरुदेव के शब्दों की स्वरधारा आज भी माँ  उषा के श्रीमुख से बरस रही है। सबकुछ यथावत, वही रस, वही आनंद, वही प्रेम की गंगा सतत बह रही है।  रेकी सेमीनार आज भी पूर्ववत इंदौर और भोपाल में चल रहे हैं। माँ ने पंचगनी{महाराष्ट्र}, देहली, माऊंट आबू जैसे बड़े स्थानों के साथ ही कई छोटे छोटे गाँव में भी सेमीनार किये हैं।

माँ उषा ने थर्ड “A” एवं मास्टर डिग्री के सेमीनार रेवा रिसोर्ट  ओंकारेश्वर , पूनम रिसोर्ट महू एवं झालरिया मठ उज्जैन में महांकालेश्वर के सानिध्य में पूर्ण किये हैं।   बसंत प्रभु के आशीर्वाद से आज भी रेकीतीर्थ समस्त रेकी पुंज को वही प्रेम और आनंद का अहसास दिला रहा है।

भागवत प्रभु
श्री एन एम भागवत प्रभु, रेकीतीर्थ के एक आधार स्तम्भ। आप ने अपने जीवन के ३३ वर्ष देश सेवा में भारतीय  सेना को समर्पित कर दिए। गुरुदेव बसंत प्रभु के साथ एक पारिवारिक सदस्य के रूप में तब से हैं जब गुरुदेव का विवाह भी नहीं हुआ था। गुरुदेव और माँ उषा के विवाह के साक्षी रहे भागवत प्रभु की रेकी यात्रा वर्ष  २००० से प्रारम्भ हुई और २००२ में आप मास्टर बने। तब से ये यात्रा आज भी अनवरत जारी है। भारतीय सेना में सेवाएँ देते हुए आपने वर्ष २००६ एवं २००७ में पोर्ट ब्लेयर अंडमान निकोबार में सफलतापूर्वक रेकी सेमिनार आयोजित किए। हर सेमिनार में गुरुदेव बसंत प्रभु और माँ उषा की छाया की तरह उपस्थित रहने वाले श्री भागवत प्रभु के बिना उनका कोई भी सेमिनार पूरा नहीं होता था, चाहे सेमिनार पुणे हो या भोपाल या देश के किसी भी कोने में  । रेकीतीर्थ परिवार के लिए आप आज भी वैसे ही उपलब्ध रहते हैं जैसे गुरुदेव के समय रहा करते थे। रेकीतीर्थ का कोई भी सेमिनार हो चाहे कोई छोटा बड़ा आयोजन इनकी उपस्थिति सर्वप्रथम देखी जा सकती है और इनका साथ इनकी धर्मपत्नी माँ कुसुम ने भी बख़ूबी निभाया।सेना से ऑडिटर के पद से रिटायर होकर वर्तमान में आपने महू (इंदौर) को ही अपनी कार्यस्थली चुना  । रेकी के आपके कई तरह के अनुभव हैं। शुरुआत में आप गुरुदेव के जितने समीप रहे रेकी से उतने ही दूरी बनाए रखी। परंतु माँ कुसुम के जीवन में रेकी से आए परिवर्तनों को देख कर इतने प्रभावित हुए कि  वो भी रेकिमय होने से अपने को रोक नहीं पाए और वर्ष २००० में स्वयं रेकी में दीक्षित हुए।सदैव  आनंदित रहने वाले भागवत प्रभु कैसी भी स्थिति परिस्थिति हो कभी विचलित नहीं होते । इनका ये मानना है कि  रेकी के कारण अपनी नौकरी के दौरान कठिन से कठिन कार्यों को भी बहुत सरलता से उन्होंने पूर्ण किया , रेकी की वजह से ही उनकी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ जैसे बच्चों की शिक्षादीक्षा , उनके विवाह आदि संस्कार ऐसे पूरे हो गए कि  उनको पता ही नहीं चला ।उनकी इस छवि और आनंदभाव को देख कर आज भी कई मित्रगण और परिवारजन  अपनी किसी भी समस्या के समाधान के लिए उनसे परमार्श लेने से अपने आप को रोक नहीं पाते हैं । ये रेकी का ही प्रभाव है कि  भागवत प्रभु उनकी हर समस्या का समाधान बहुत ही सरल तरीक़े से निकाल लेते हैं।

 राज बहादुर ज्ञानी प्रभु 
रेकीतीर्थ परिवार में सबसे उत्साही और सबका चहेता, सबका प्यारा, हमेशां  दूसरों के लिए प्रेरणा स्तोत्र बने रहने वाला, जिसने रेकीतीर्थ में आने वाले हर उदास चेहरे पर मुस्कान बिखेर दी, जिसने सबके दिलों पर राज किया, जो बहादुर तो है ही, ज्ञानी भी है उस सक्षीयत का एक ही नाम हो सकता है “राज बहादुर ज्ञानी” ।“बी कोम” शिक्षित, पेशे से ओटोमोबाइल व्यवसायी, देशी विदेशी नए पुराने सिक्कों और नोटों के संग्रहण कर्ता और उनकी गहनतम जानकारी रखनेवाले ज्ञानी प्रभु वर्ष १९९६ अर्थात गुरुदेव बसंत प्रभु और माँ उषा की रेकी यात्रा के प्रारम्भ से ही उनके साथ जुड़े और ये यात्रा आज भी सतत जारी है।आपकी  बहन का पक्षाघात (लकवा) से ग्रसित हो जाना और रेकी के प्रभाव से उनका बच जाना, इस घटना ने उन्हें इस अद्भुत विद्या  को सिखने के लिए प्रेरित किया । उन्हीं के शब्दों में “ मेरी बहन पर पक्षाघात का यह हमला मेरे जीवन को पूर्णरूप से बदलने वाली घटना सिद्ध हुई, जिसने मुझे अस्तित्व को एक नए आयाम में खोजने में मदद की। रेकी ने मेरे जीवन  की दिशा और दशा दोनो बदल दी”।इनका मानना है कि  एट्यूनमेंट के दौरान हीलिंग सेंसेसन और वायब्रेशन का अनुभव एक अलग ही अनुभूति में ले जाता है ।हालाँकि ये अनुभूति हर व्यक्ति के लिए अलग अलग  होती है फिर भी जीवन में कई बदलाव लाने वाली होती है । इन जीवन में पहली बार लगा की “संतुलन” कैसा होता है। मेरा हर भावनात्मक कचरा विसर्जित हो गया और उस हर क्षण को मैंने प्यार से जिया।”उनके शब्दों में “ मैंने अपने पूरे शरीर में ऊर्जा का विस्फोट अनुभव किया  और ऐसा लगा जैसे एक नई चेतना का जागरण मेरे अंदर हुआ है। मेरी सारी चिन्ताएँ जाती रही, मैंने अपने अंदर प्रेम की  बाढ़ को महसूस किया, चीज़ों को, घटनाओं को अधिक स्पष्ट देखने के दृष्टि आइ, जीवन में परिवर्तन के अधिक सकारात्मक विकल्प दिखाई देने लगे । इनका कहना है कि  रेकी हमारे जीवन को बदल तो नहीं सकती पर उसे देखने का हमारा दृष्टिकोंण बदल देती है । जीवन को देखने की यही दृष्टि हमें शांति, प्रेम, करुणा और ज्ञान प्रदान करती  है और हमें आनंद के मार्ग पर अग्रसर करती है। रेकी को अपनाकर हम आनेवाली समस्याओं के समाधान का , चुनौतियों का पूर्वाभास कर , उचित मार्ग खोजने में सक्षम हो जाते हैं । अपने जीवन की ज़िम्मेदारी जैसे ही हम अपने हाथ में लेते हैं जीवन में बदलाव की संभावनाओं के अनगिनत द्वार हमें दिखाई देने लगते हैं । जैसे ही हम अपने आप में बदलाव लाने लगते हैं हमारे आसपास भी सकारात्मक बदलाव होने लगते हैं क्योंकि  हर तरफ़ उसी एक परमात्मा का ही तो विस्तार है।

मनोज प्रभु,
सदैव  धीर गम्भीर दिखाई देने वाले मनोज प्रभु की रेकी यात्रा मात्र १८ वर्ष की उम्र में ही शुरू हो गई  जब गुरुदेव बसंत प्रभु ने मई १९९८ में रेकी सेमिनार आयोजित किया। कहीं से मनोज प्रभु ने सुना कि केवल हाथ लगा कर ही किसी भी बीमारी का इलाज हो सकता है,  तत्काल उनके अंतरतम में एक विस्मययुक्त जिज्ञासा पैदा हुई कि क्या ऐसा भी सम्भव है ? इसी विस्मय और जिज्ञासा ने उन्हें गुरुदेव के सेमिनार तक पहुँचा दिया । उनका ये विस्मय और भी बढ़ा जब रेकी सिखते समय जो उनके हाथ पर पुराना दाद कई इलाज के बाद भी ठीक होने का नाम नहीं ले रहा था वो रेकी के प्रभाव से  एक माह में ही ठीक हो गया । इस अनुभव ने उन्हें रेकी सेकंड डिग्री करने को प्रेरित किया जो जुलाई ९८ में पूरी हुई और वर्ष २००० में ये मास्टर बने।इसके बाद तो रेकी के ऐसे अनगिनत अनुभव उनको हुए कि  वो पूरे रेकीमय हो गए ।आज १९ -२० वर्षों में रेकी उनके जीवन में रच बस गई । रेकी के प्रभाव से कई वर्षों से बिस्तर पर लेटा व्यक्ति अगर २ माह में चलने फिरने लग जाय, किसी का सालों पुराना दर्द १५ दिन में चला जाय, केन्सर का पेशेंट जिसे बॉम्बे के डॉक्टर ने  २ से ३ माह का जीवन बता दिया हो और वो व्यक्ति २ -३ माह में भरपेट खाना पीना शुरू कर दे और बच जाय , डॉक्टर द्वारा ऑपरेशन से डिलीवरी की घोषणा के बाद भी नोर्मल डिलीवरी हो जाय, किसी व्यक्ति का सालों पुराना साइनस ठीक हो जाए तो इन्हें चमत्कार नहीं तो और क्या कहेंगे। इन्ही चमत्कारों के कारण आज रेकी उनकी आत्मा बन गई  और “रेकीतीर्थ” सच में ही उनके लिए तीर्थ ।इनका मानना है कि  आपकी कोई भी समस्या हो मानसिक हो, शारीरिक हो चाहे आध्यात्मिक हो रेकी सभी समस्याओं का समाधान उपलब्ध करवा देती है। सदैव  रेकी, रेकीतीर्थ, गुरुदेव बसंत प्रभु और माँ उषा के प्रति समर्पित रहने वाले मनोज प्रभु अपने जीवन को रेकी का दिया हुआ ही मानते हैं क्योंकि वर्ष २००२ में मरणासन्न  अवस्था में आ जाने और डॉक्टर द्वारा जवाब दे देने के बावजूद इन्होंने रेकी और गुरुदेव पर श्रद्धा रखी और आज भी रेकी परिवार के साथ है ।

मुकेश प्रभु
सरल सौम्य और सदा चेहरे पर मुस्कुराहट के धनी मुकेश प्रभु की उपस्थिति रेकी तीर्थ के हर सेमिनार, हर कार्यक्रम को जीवंतता प्रदान कर देती है । आपका अपना स्वयं का व्यवसाय है, जिसके माध्यम से ये लोगों को बताते हैं कि  अपने कठिन परिश्रम से अर्जित धन को कहाँ पर लगाया जाय ताकि ना केवल वो सुरक्षित रहे बल्कि एक सुनिश्चित और समयबद्ध आय भी देता रहे । मुकेश प्रभु का कहना है की जिस प्रकार जीवन को सुखी और समृद्धिशाली बनाने के लिए शिक्षा की आवश्यकता है वैसे ही मन की शांति बनाए रखने, आनंदित रहने और सदैव ऊर्जावान बने रहने के लिए आध्यात्मिक शिक्षा की भी आवश्यकता होती है । उनकी इसी आवश्यकता ने उन्हें वर्ष २००५ में गुरुदेव श्री बसंत प्रभु और उषा माँ तक पहुँचाया , तब से आज तक १३-१४ वर्ष कैसे आनंद भाव में बीत गए इन्हें पता ही नहीं चला । इनका ये मानना है कि  रेकी के प्रभाव से इनमे आत्मविश्वास पैदा हुआ, जीवन जीने के आयाम बदल गए, जीवन में आनेवाली हर समस्या का समाधान अपने आप होता गया और वे आज चिंतामुक्त जीवन यापन कर रहे हैं।रेकी के कई चमत्कार इनके जीवन में घटित हुए, जिन्होंने रेकी पर उनके विश्वास को और भी मजबूत  कर दिया। चमत्कार चाहे उनकी माँ के जटिल ऑपरेशन से उबरने का हो चाहे उनकी भाभी की सर्जिकल डिलीवरी  का नोर्मल डिलीवरी में बदलने का, हर चमत्कार ने रेकी पर उनके विश्वास को और मजबूत किया ।मुकेश प्रभु की पत्नी का कहना है कि  “उनके गर्भ धारण करने के बाद मुकेश प्रभु ने गुरुदेव बसंत प्रभु के निर्देशानुसार गर्भस्थ  शिशु को हर माह, हर चक्र पर रेकी हीलिंग दी, उसी का परिणाम ये रहा की डिलीवरी के समय वो सामने टँगी घड़ी देखती  रही और पता ही नहीं चला कि कब डिलिवरी हो गयी ।”मुकेश प्रभु के शब्दों में “ या तो आप पूरी ज़िंदगी बच्चे के ऊपर ध्यान देते  रहो या बच्चे को गर्भ के समय पूरे ९ महीने रेकी दे दो , उसके बाक़ी जीवन में रेकी उसके लिए सब कुछ करेगी ।”आज वो जो कुछ भी हैं, उनका मानना है कि  वो गुरुदेव और उषा माँ के कारण हैं, जिन्होंने उस परम शक्ति से उनका परिचय करवाया, जिसके सानिध्य में वो आज आनंदित और ख़ुशियों से भरा जीवन जी  रहे हैं।उनका अब एक ही उद्धेश्य है कि वो अधिक से अधिक लोगों के जीवन में वही ख़ुशी, वही आनंद भर सकें जो उन्हें रेकी से मिला। इसके लिए वो गुरुदेव, उषा माँ और अपने माता पिता का आभार मानते हैं।